मानव जीवन की सार्थकता मानव निर्माण की अवधारणा, सामाजिक सद्भाव, समाज के निर्बल व कमजोर वर्ग के बच्चों की उच्च शिक्षा विशेषकर बालिका शिक्षा आदि इत्यादि विभिन्न विचारों ने महाविद्यालय के संस्थापक व अध्यक्ष श्री लल्लन सिंह को उद्वेलित किया। वस्तुतः विद्या विनय एवं अनुशासन की गरिमा के प्रति छात्र जीवन से ही श्री सिंह के मन में अनुराग रहा है, जिसे ईश्वरीय प्रेरणा अथवा पूर्व जन्मों का संस्कार कहा जा सकता है। उच्च शिक्षा ग्रामीण क्षेत्र की आवश्य क आवश्यकता है और अति पिछड़े क्षेत्र में जहाँ गरीब किसान ही बसते हैं, उनकी बालिकाओं हेतु उच्च शिक्षा की व्यवस्था परम आवश्यक है। इन्ही विचारों ने श्री सिंह के मन में महाविद्यालय की स्थापना का बीजारोपण किया। सन् 1979 ई0 में परास्नातक करने के बाद कृषि कार्य करते हुए श्री सिंह ने अपने अनन्य सहयोगियों सर्वश्री खालिक खाँ, पं0 सच्चिदानन्द त्रिपाठी, रामदरश यादव, निसार अहमद खाँ, वहीद अहमद खाँ, समद खाँ एवं भागवत सिंह के साथ अपनी जन्मभूमि रकसा में महाविद्यालय स्थापना का संकल्प लिया।
संकल्प बड़ा था, आर्थिक संसाधनों का अभाव, फिर भी महाविद्यालय स्थापना के निमित्त श्री सिंह ने अपने अनन्य सहयोगियों एवं क्षेत्रीय सहयोगियों से 6 अगस्त सन् 1989 ई0 को ग्राम रकसा में बैठक आयोजित किया। सर्वसमभाव से महाविद्यालय का नामकरण 'किसान महाविद्यालय रकसा' एवं संचालन करने वाली सोसाइटी का नाम किसान कल्याणकारी संस्थान रकसा, रतसर-बलिया रखा गया। सोसाइटी का गठन एवं भूमिदाताओं से महाविद्यालय के नाम आवश्यक भूमि रजिस्ट्री वायनामा कराने के उपरान्त वसंत पंचमी जनवरी, 1990 को भूमि पूजन कराकर महाविद्यालय का निर्माण प्रारम्भ किया गया। भवन निर्माण एवं सम्बद्धता सम्बन्धित समस्त औपचारिकताओं को चार वर्ष के अथक प्रयास से पूर्ण करने के उपरान्त महाविद्यालय को उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 01 जुलाई, 1993 से कला स्नातक स्तर पर कुल छ: विषयों के साथ वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर-उत्तर प्रदेश से सम्बद्धता प्रदान की गयी। दिनांक 01.07.1996 ई0 से स्थाई सम्बद्धता प्राप्त होने के उपरान्त ही महाविद्यालय प्रबन्धन द्वारा वेतन संदाय हेतु पत्रावली शासन को प्रेषित कर दी गयी, परन्तु शासन की त्रुटिपूर्ण नीतियों के कारण आज भी वह लम्बित है, तथापि इस दिशा में प्रबन्धन सतत प्रयासरत है।